महंगी किताबों का खेल : शिक्षा के नाम पर अभिभावकों से ‘वसूली’ का आरोप

सिलेबस वही, किताबें महंगी; प्राइवेट पब्लिशर्स के जरिए स्कूलों पर उठे सवाल

नई दिल्ली। देशभर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल हो रहे वीडियो में अभिभावक स्कूलों द्वारा निर्धारित महंगी किताबों के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। कई मामलों में पहली कक्षा के बच्चों की किताबों का खर्च 8,500 से 12,000 रुपये तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है, जिससे अभिभावक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

अभिभावकों का कहना है कि जब एक ही सिलेबस को सस्ती किताबों से पढ़ाया जा सकता है, तो फिर स्कूलों द्वारा महंगी किताबें क्यों अनिवार्य की जा रही हैं।

सिलेबस तय, किताबों पर स्कूलों का नियंत्रण

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्रीय बोर्ड केवल सिलेबस निर्धारित करता है, जबकि किस प्रकाशक की किताबें पढ़ाई जाएंगी, यह निर्णय स्कूलों के हाथ में होता है। इसी व्यवस्था का फायदा उठाते हुए कई स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें लागू कर देते हैं।

जहां एक ओर एनसीईआरटी की किताबों का पूरा सेट कुछ सौ रुपये में उपलब्ध हो जाता है, वहीं दूसरी ओर प्राइवेट पब्लिशर्स की एक-एक किताब 600–700 रुपये तक की होती है। ऐसे में 10–12 किताबों का सेट आसानी से 10,000 रुपये तक पहुंच जाता है।

‘यहीं से खरीदो’ की शर्त पर सवाल

अभिभावकों की सबसे बड़ी आपत्ति इस बात को लेकर है कि कई स्कूल किताबें केवल निर्धारित दुकानों से ही खरीदने की शर्त रखते हैं। जबकि नियमों के अनुसार किसी एक दुकान से खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

इस स्थिति को अभिभावक ‘शिक्षा के नाम पर संगठित वसूली’ बता रहे हैं।

बड़े सवाल खड़े

जब सिलेबस एक ही है, तो महंगी किताबें क्यों?

क्या यह बच्चों की पढ़ाई के लिए जरूरी है या स्कूल-पब्लिशर्स की मिलीभगत?

नियम होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उनका पालन क्यों नहीं हो रहा?

सरकार से जवाब की मांग

अभिभावक और शिक्षा से जुड़े लोग सरकार से इस मुद्दे पर सख्त कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि किताबों की कीमत और चयन को लेकर स्पष्ट और कड़े नियम बनाए जाएं, ताकि अभिभावकों को अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार किताबें खरीदने की आजादी मिल सके।

निष्कर्ष:

यह मामला केवल किताबों की कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और नैतिकता पर भी सवाल उठाता है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में शिक्षा का अधिकार नहीं, बल्कि भुगतान क्षमता ही प्रवेश का आधार बन सकती है।

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